Friday, 7 December 2018

नवाचार ने दी आदिवासियों की आजीविका विकास को नई दिशा

नवाचार ने दी आदिवासियों की आजीविका विकास को नई दिशा

महात्मा गांधी नरेगा और भारतीय कृषि विज्ञान अनुसंधान की आदिवासी उपयोजना के अभिसरण से हुई स्थापित हुई केंचुआ खाद उत्पादन इकाई

ग्रामीण भारत, युवाओं के लिए संभावनाओं से भरा हुआ है। संसाधनों की उपलब्धता और उचित मार्गदर्शन से ग्रामीण युवाओं के जीवन को एक नई दिशा दी जा सकती है, जो उनके लिए एक नवाचार साबित हो सकती है। हर एक कार्य क्षेत्र में नवाचार, सफलता की राह जरुर दिखाता है। कार्य क्षेत्र कोई भी हो, बस शुरुआत होनी चाहिए। ऐसी ही शुरुआत कोरिया जिले के बैकुण्ठपुर विकासखण्ड की ग्राम पंचायत-जगतपुर में आदिवासी युवकों के द्वारा संचालित वर्मी कम्पोस्ट (केंचुआ खाद) उत्पाद इकाई को देखकर मिलती है। जहाँ युवाओं ने इकाई स्थापना के बाद से दो चरणों में लगभग 2.50 लाख और 3 लाख रुपये की जैविक खाद की बिक्री की है और 3 लाख रुपये की जैविक (केंचुआ) खाद बनकर तैयार है। इस कार्य में जहाँ उन्हें महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना और भारतीय कृषि विज्ञान अनुसंधान की आदिवासी उपयोजना के अभिसरण से संसाधन मिले और वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन इकाई की स्थापना की, वहीं कृषि विज्ञान केन्द्र के वैज्ञानिकों से सही और नियमित रुप से मार्गदर्शन भी प्राप्त किया।

            जगतपुर ग्राम पंचायत में स्थापित वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन इकाई से कोरिया एग्रो प्रोड्यूसर कम्पनी के नाम से केंचुआ खाद की बिक्री होती है। यह कम्पनी कृषि विज्ञान केन्द्र ने क्षेत्र के किसानों को लेकर बनाई है, जिसमें उत्पादन इकाई के सदस्य भी शामिल हैं। यहाँ कार्यरत आदिवासी शोभनाथ सिंह ने बताया कि वर्तमान में उत्पादन इकाई में मेरे साथ गांव के 10 सदस्य नियमित और सक्रिय रुप से एक टीम के रुप में काम कर रहे हैं। पिछले साल 2017-18 में लगभग 35 टन केंचुआ खाद का उत्पादन किया गया था। जैविक खाद के उपयोग करने से भूमि की गुणवत्ता में सुधार आता है और जल धारण क्षमता भी बढ़ती है। इसलिए समूह के सदस्यों ने सबसे पहले अपनी मेहनत से तैयार किये गए खाद का उपयोग अपने-अपने खेतों में किया। इसके साथ ही शासकीय विभागों और आस-पास के किसानों को खाद भी बेची। इससे लगभग 2 लाख 50 हजार रुपये की आमदनी भी हुई।

            समूह के ही अन्य सदस्य श्री जलजीत सिंह ने शोभनाथ सिंह की बात को आगे बढ़ाते हुए बताया कि यह काम उन्हें और उनके समूह को अच्छा लगा। कृषि विज्ञान केन्द्र-बैकुण्ठपुर के वैज्ञानिकों ने हमें वर्मी कम्पोस्ट उत्पादन इकाई में केंचुआ खाद बनाने का तरीका सिखाया, और आज भी हमें नियमित रुप से मार्गदर्शन दे रहते हैं। कम समय में मेहनत करके पैसा कमाने का साधन होने के कारण हमने वर्मी कम्पोस्ट में ही मेहनत करने का सोचा। आज हमारी मेहनत रंग ला रही है। इस साल 2018-19 में अब तक उत्पादन इकाई से हमने लगभग 50 टन केंचुआ खाद बनाई है और इसमें से 3 लाख रुपये की खाद बेच भी चुके हैं।

जैविक खाद का उपयोग और वर्मी कम्पोस्ट के प्रति बढ़ी है रुचि
            सरपंच श्री शिवप्रसाद सिंह ने, गांव में बन रही केंचुआ खाद के संबंध में खुशी व्यक्त करते हुये कहा कि महात्मा गांधी नरेगा और कृषि विज्ञान केन्द्र के इस तालमेल से आर्थिक प्रगति की जो राह इन युवकों को दिखाई गई है, उसका व्यापक परिणाम देखने को मिल रहा है। इनके द्वारा केंचुआ खाद बनाने के बाद इलाके में जैविक खाद के उपयोग और वर्मी कम्पोस्ट टेंक तैयार करने के प्रति रुचि दिखाई दे रही है। बैकुण्ठपुर विकासखण्ड में ही ग्राम पंचायत- बरबसपुर, लौहारी, उमझर, नगर और रटगा के ग्रामीण ने उत्पादन केन्द्र को देखा है। वहीं सोनहत विकासखण्ड के ग्राम पंचायत- सुन्दरपुर, लटमा और भैंसवार के ग्रामीणों ने भी उत्पादन केन्द्र जैविक खाद को तैयार करने के तरीके को जाना और समझा। कृषि विज्ञान केन्द्र को मनेन्द्रगढ़ विकासखण्ड की ग्राम पंचायत-उजियारपुर से तो इसी तरह का केन्द्र स्थापित करने का आवेदन भी प्राप्त हुआ है।

कुछ नया करने का इरादा
            कृषि विज्ञान केन्द्र-बैकुण्ठपुर के फील्ड असिस्टेन्ट श्री फैय्याज आलम के मुताबिक गांव के युवक कुछ नया करना चाहते थे। उनके आवेदन पर उन्हें वर्मी कम्पोस्ट पर 90-घंटो का विशेष प्रशिक्षण मुख्यमंत्री कौशल विकास योजना के अंतर्गत दिया गया था। प्रशिक्षण के बाद उत्तीर्ण प्रशिक्षणार्थियों की रुचि के आधार पर कृषि विज्ञान केन्द्र के द्वारा 21 युवाओं का एक समूह तैयार किया गया । वरिष्ठ वैज्ञानिक एवं केन्द्र प्रमुख श्री रंजीत सिंह राजपूत के निर्देशन में इनकी आजीविका के विकास के लिए 12 लाख 90 हजार रुपयों की लागत का एक सामूहिक वर्मी कम्पोस्ट खाद उत्पादन सह शेड निर्माण का प्रोजेक्ट तैयार किया गया। प्रोजेक्ट में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (महात्मा गांधी नरेगा) से 9 लाख  90 हजार रुपए और भारतीय कृषि विज्ञान अनुसंधान की आदिवासी उपयोजना से 3 लाख रुपयों का अभिसरण किया गया। प्रोजेक्ट के विषय-वस्तु विशेषज्ञ श्री संदीप शर्मा के मार्गदर्शन में 21 मार्च, 2017 को प्रोजेक्ट की आधारशिला समूह के युवकों ने मिलकर रखी। युवकों की मेहनत का ही परिणाम था कि लगभग तीन महीने के भीतर ही 94-नग वर्मी कम्पोस्ट टेंक मय शेड के साथ केंचुआ खाद उत्पादन इकाई बनकर तैयार हो गई। वर्तमान में यहाँ नियमित और सक्रियता के साथ समूह के 11 सदस्य काम कर रहे हैं, शेष सदस्य खेती व अन्य कार्यों में लगे हैं।

टीम वर्क से होता है सब काम
            केंचुआ लाना हो या वर्मी कम्पोस्ट बनाना अथवा 25 किलो खाद की पैकिंग से बोरी तैयार करना, ये सभी कार्य समूह के सदस्य टीमवर्क के रुप में करते हैं। समूह के सदस्य श्री अवधनारायण जैविक खाद बनाने की प्रकिया के बारे में बताते हैं कि सबसे पहले पिट को बनाया जाता है। इसके बाद उसमें मिट्टी को डालकर उसे अच्छी तरह से दबा-दबा कर बैठाया और मजबूत किया जाता है। इसके बाद उसमें सड़ने योग्य भूसा, हरा पत्ता, चारा, खरपतवार, गोबर, मिट्टी आदि डालकर खाद बनाने के लिए उसमें केंचुआ छोड़ दिया जाता है। लगभग डेढ़ महीने के बाद में जैविक खाद प्राप्त हो जाता है। समूह के द्वारा स्थानीय तौर पर 9 रुपये प्रति किलो की दर से 25 किलो का बोरा बेचा जा रहा है।

            समूह के इस कार्य और उन्हें मिल रहे लाभ को देखकर यह निश्चित तौर पर कहा जा सकता है कि योजनाओं के परस्पर तालमेल और विशेषज्ञों के नियमित मार्गदर्शन ने इस नवाचार को सार्थक कर दिया है।

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